Sunday, June 3

अब तो तेरी आवाज़!


खाने के नाम पे अपने गम को खा जाता हूँ,
प्यास लगती हे तो इन आँसुओ को पी जाता हूँ,

एक झूठी मुस्कान का चादर ओढ़े सबको बेवकूफ़ बना जाता हूँ,
चली गयी कहीं मुझे इस भीड़ में अकेला छोड़े,
इसी बात से परेशान हो जाता हूँ,

नींद में कई रंगीन ख्वाब बुन जाता हूँ,
तू सपनो में तो आएगी यही सोच घंटो सो जाता हूँ,

वो लम्हे याद करके आज भी मुस्कुरा जाता हूँ,
थोड़ा पागल पहले से था, थोड़ा तेरा नाम सुनने से हो जाता हूँ,

 आगे बढ़ने की चाहत बहुत होती हे,
पर तू आएगी वापस, इसी उम्मीद में बेथ जाता हू,

साथ निभाने वाले लोग हे मेरे साथ,
पर तन्हाई में तेरा साथ ना पाकर रो जाता हूँ,

जानता हूँ अब सब पहले जेसा नही हो सकता,
पर तब भी अपने मन को बहला जाता हूँ,

तुझे भूलना आसान नही,
क्योंकि हर वक़्त तेरी यादों में खोया रहता हूँ,

फ़ुर्सत के लम्हों में कुछ लिखता जाता हू,
पर हर पन्ने पे तेरा ज़िक्र पाता हूँ,

जान, अब तो तेरी आवाज़ सुनने को भी तरस जाता हूँ! 

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